Posted by: aektinka | April 5, 2008

एक शिकस्ता खोपड़ी_ आदिल मन्सूरी

 

एक शिकस्ता खोपड़ी

 

गर्म नीले जीस्ममे से

गोश्त के  उन लोथड़ों को नोच लुं

रच गया है जिनमें मेरे और तेरे अजदादका खुं

नोचलुं और नोचकर

बूढे कब्रस्तान की तूटी हुई कब्रोंसे बाहर

झांकती सब हड्डियों पर थोप दुं,

एक शिकस्ता खोपरीमें

खून भर कर पियुं

घास पर बैठे हुए आकाश के चेहरे पे थुकुं

पांव में मरते हुए पानी को एक ठोकर लगाउं

आगमें रस्ता बनाउं

दो लरजती उंग्लियों के दरमियां

गेहुं के दानो को रख कर

देर तक रोता रहुं

 

_ आदिल मन्सूरी

 

 


Leave a response

Your response:

Categories