एक शिकस्ता खोपड़ी
गर्म नीले जीस्ममे से
गोश्त के उन लोथड़ों को नोच लुं
रच गया है जिनमें मेरे और तेरे अजदादका खुं
नोचलुं और नोचकर
बूढे कब्रस्तान की तूटी हुई कब्रोंसे बाहर
झांकती सब हड्डियों पर थोप दुं,
एक शिकस्ता खोपरीमें
खून भर कर पियुं
घास पर बैठे हुए आकाश के चेहरे पे थुकुं
पांव में मरते हुए पानी को एक ठोकर लगाउं
आगमें रस्ता बनाउं
दो लरजती उंग्लियों के दरमियां
गेहुं के दानो को रख कर
देर तक रोता रहुं
_ आदिल मन्सूरी
