आवाज की दीवार
आवाज की दीवार भी चुप चाप खडी थी
खिड्की से जो देखा तो गली उंघ रही थी
बातों ने तो तेरा लम्स महसूस किया था
लेकीन ये खबर दिलने बडी देरसे दी थी
हाथों में नया चांद पडा हांफ रहा था
रानो पे बरहना_सी नमीं रेंग रही थी
यादों ने उसे तोड दिया मार के पत्थर
आईने की खंदक में जो परछाई पड़ी थी
दुनिया की गुजरते हुए पड़ती थी निगांहे
शीशे कि जगह खीड़की में रुस्वाई जड़ी थी
टूटी हुई महराब से गुम्बद के खंडहर पर
ईक बूढे मुअज्जिन की सदा गुंज रही थी
_ आदिल मन्सूरी
(हश्रकी सुबह दरखशां हो_155)
वाह!सुबहानअल्लाह!
सन्नाटे का आलम बहोत खूब पेश किया है.
रज़िया मिर्ज़ा
By: RAZIA on April 21, 2008
at 10:22 am