Posted by: aektinka | March 26, 2008

आबाद शहरको छोड कर__ आदिल मन्सूरीآباد شہر چھوڑ کے۔۔۔عادل منصوری

bam2deewaodar.jpg 

आबाद शहरको छोड कर

आबाद शहरको छोड कर सुनसान रास्ते
जंगल के सिम्त जाने किसे ढुंढने लगे

क्या पूछ्ते हो कैसे रहे दिन बहार के
गर फूल, बेशुमार थे कांटे भी कम न थे

घरसे गलीकी सिम्त मेरे पांव जब बढे
दरवाजे पूछ्ने लगे साहब किधर चले

हद्दे_ नजर तलक मेरे दीवारए बामो दर
हसरत भरी नजरसे मुझे देखते रहे

पानी पिलाने वाला वहां कोइ भी नथा
पनघट के पास जा के भी हम तिशन लब रहे

शोले उगलते गुजरी है सड्कोंसे दो पहर
आदिल तमाम पेडोंके साये वो जल गये

_ आदिल मन्सूरी

(हश्रकी सुबह दरखशां हो_154)

abaadshaher.jpg

 


Leave a response

Your response:

Categories