आबाद शहरको छोड कर
आबाद शहरको छोड कर सुनसान रास्ते
जंगल के सिम्त जाने किसे ढुंढने लगे
क्या पूछ्ते हो कैसे रहे दिन बहार के
गर फूल, बेशुमार थे कांटे भी कम न थे
घरसे गलीकी सिम्त मेरे पांव जब बढे
दरवाजे पूछ्ने लगे साहब किधर चले
हद्दे_ नजर तलक मेरे दीवारए बामो दर
हसरत भरी नजरसे मुझे देखते रहे
पानी पिलाने वाला वहां कोइ भी नथा
पनघट के पास जा के भी हम तिशन लब रहे
शोले उगलते गुजरी है सड्कोंसे दो पहर
आदिल तमाम पेडोंके साये वो जल गये
_ आदिल मन्सूरी
(हश्रकी सुबह दरखशां हो_154)
